शोध एवं मंथन

जय श्री जगन्नाथ* *जगन्नाथ जी रथ यात्रा महत्व*

संपूर्ण जगत के स्वामी।

जय श्री जगन्नाथ*
*जगन्नाथ जी रथ यात्रा महत्व*

          *जय श्री जगन्नाथ*
*जगन्नाथ जी रथ यात्रा महत्व*

  • जग” यानी संसार और “नाथ” यानी स्वामी — जगन्नाथ का अर्थ है संपूर्ण जगत के स्वामी।

श्री जगन्नाथ स्वामी,
नयन-पथ-गामी भवतु मे।
श्री जगन्नाथ स्वामी,
नयन-पथ-गामी भवतु मे।।

बलभद्र सुभद्रा संग,
सिंहासन पर शोभित अंग।
नीलाचल में वास तुम्हारा,
जग के पालनहार तुम्हारा।।
श्री जगन्नाथ स्वामी,
नयन-पथ-गामी भवतु मे।।

रथ पे चढ़ के करते सवारी,
हरते सबकी दुख की बारी।
भक्तों के तुम हो दुलारे,
दर्शन मात्र से दुख हारे।।
श्री जगन्नाथ स्वामी,
नयन-पथ-गामी भवतु मे।।

हे कृष्ण राधा के प्यारे,
दीनों के तुम रखवाले।
मुरलीधर मधुसूदन प्यारे,
हर दिल में हो तेरे सहारे।।
श्री जगन्नाथ स्वामी,
नयन-पथ-गामी भवतु मे।।

जगन्नाथ धाम, जिसे चार प्रमुख धामों में से एक माना जाता है, के मंदिर का ध्वज हमेशा हवा की दिशा के विपरीत लहराता है, जो एक प्राकृतिक चमत्कार है।

· पुरी स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर की रसोई में प्रतिदिन 56 प्रकार का भोग बनाया जाता है और यहाँ प्रसाद की कोई कमी या अधिकता नहीं होती।

· भगवान जगन्नाथ की लकड़ी की मूर्तियों को हर 8, 11, 12 या 19 वर्षों में बदलने की प्रक्रिया को नबकलेबारा कहा जाता है, जिसमें पवित्र नीम के पेड़ के चयन के लिए गुप्त मंत्रों और ज्योतिषीय गणना का उपयोग किया जाता है।

पुरी (ओडिशा) में स्थित श्री जगन्नाथ धाम को चार प्रमुख धामों में से एक माना गया है – बद्रीनाथ, द्वारका, रामेश्वरम् और पुरी। यह मंदिर न केवल भगवान विष्णु यानि भगवान् जगन्नाथ का निवासस्थान है, बल्कि यह स्थान शक्ति, रहस्य और चमत्कार काअद्भुत संगम है।
*भगवान जगन्नाथ जी के 10 रहस्य*
जो भक्तों और वैज्ञानिकों दोनों को चकित करते हैं।जगन्नाथ धाम के 10 रहस्य :-
(1) पुरी में हवा समुद्र से आती है, यानी समुद्र से भूमि की ओर बहती है, लेकिन जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर लगा ध्वज हमेशा हवा की दिशा के विपरीत लहराता है। यह प्राकृतिक नियमों के विपरीत है और आज तक रहस्य बना हुआ है।

(2)मंदिर के ऊपर स्थित सुदर्शन चक्र किसी भी स्थान से देखने पर हमेशा सामने की ओर दिखाई देता है। यह अद्भुत दृष्टिभ्रम है।

(3) मंदिर के सिंहद्वार में प्रवेश करते ही समुद्र की लहरों की आवाज़ सुनाई नहीं देती, जबकि बाहर खड़े होने पर यह आवाज़ स्पष्ट सुनाई देती है।

(4) मंदिर का मुख्य शिखर (गर्भगृह) दिन के किसी भी समय छाया नहीं डालता। यह वास्तुकला का अद्भुत चमत्कार है। भोर और संध्या के समय सूर्य की किरणें सीधे जगन्नाथ मंदिर के सिंहद्वार पर गिरती हैं, जो अत्यंत शुभ मानी जाती हैं।

 (5) मंदिर की रसोई में प्रतिदिन 56 प्रकार का भोग बनता है। चाहे भक्तों की संख्या कितनी भी हो, प्रसाद कभी कम नहीं पड़ता और न ही अधिक बचता है। पुरी मंदिर की रसोई में 400 से अधिक चूल्हे और सात मिट्टी के बर्तनों की परतें एकसाथ रखी जाती हैं। आश्चर्य यह कि सबसे ऊपर का बर्तन पहले पकता है, नीचे का बाद में!

(6) हर 8, 11, 12 या 19 वर्षों में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन की लकड़ी की मूर्तियाँ बदली जाती हैं। इसे नबकलेबारा कहा जाता है। इस प्रक्रिया में नीम के पवित्र पेड़ (दरु ब्रह्म) का चयन गुप्त मंत्रों और ज्योतिषीय गणना से होता है।

(7) पुरी मंदिर के आसपास शंख बजाने पर समुद्र की लहरें धीमी हो जाती हैं और मंदिर से दूर जाने पर उनकी आवाज़ तेज हो जाती है। स्थानीय मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ शंखध्वनि सुनते हैं, इसलिए समुद्र भी शांत हो जाता है।

(8)प्रतिदिन मंदिर के शिखर पर 45 मंज़िल ऊँचाई पर चढ़कर पुजारी ध्वज बदलते हैं। यह परंपरा सदियों से बिना रुके चल रही है।

(9) पुरी में मृत्यु को मोक्षदायी माना जाता है। यहाँ मरणासन्न व्यक्ति को महाप्रसाद खिलाने की परंपरा है, जिससे उसे मुक्ति मिलती है।

(10) पुरी में मां विमला देवी को जगन्नाथ धाम की अधिष्ठात्री शक्ति कहा गया है। जगन्नाथ जी को अर्पित भोग तभी महाप्रसाद कहलाता है जब पहले वह मां विमला देवी को अर्पित किया जाए। उनकी पूजा के बिना जगन्नाथ की पूजा अधूरी मानी जाती है।

भगवान श्री जगन्नाथ जी को विष्णु जी का अवतार माना जाता है। उनकी मूर्ति पुरी (ओडिशा) के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर में स्थित है, जो चार धामों में से एक है। आइए जानते हैं उनकी पावन  कथा:-
प्राचीन काल में मालवा देश में एक राजा थे, जिनका नाम इंद्रद्युम्न था। वे भगवान विष्णु के परम भक्त थे और एक दिन उन्होंने स्वप्न में देखा कि भगवान नीलमाधव एक गुफा में निवास करते हैं। उन्होंने अपने दूत विद्यापति को उन्हें ढूँढने भेजा।

विद्यापति को भगवान नीलमाधव (जो विष्णु जी का रूप थे) एक शबर (वनवासी) परिवार में दर्शन हुए। राजा इंद्रद्युम्न जब वहाँ पहुँचे, तब तक नीलमाधव अंतर्ध्यान हो चुके थे। लेकिन उन्हें आकाशवाणी हुई कि भगवान एक विशेष रूप में प्रकट होंगे।

*नीम की लकड़ी से मूर्ति निर्माण -*

एक दिन समुद्र के किनारे एक रहस्यमय विशाल काष्ठदंड (नीम की लकड़ी) बहकर आया। आकाशवाणी हुई कि इसी से भगवान की मूर्ति बनानी है। तब एक वृद्ध कारीगर (स्वयं भगवान विष्णु) मूर्तियाँ बनाने के लिए आया। उसने शर्त रखी कि जब तक वह कक्ष से बाहर न आए, कोई अंदर न देखे।

राजा ने यह स्वीकार कर लिया, लेकिन 21 दिन बाद कारीगर बाहर नहीं आया, तो रानी ने चिंता में दरवाजा खुलवा दिया। तभी वृद्ध अदृश्य हो गया और अधूरी मूर्तियाँ सामने थीं—भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की। इन्हीं अधूरी मूर्तियों की पूजा आज भी की जाती है।

 *जगन्नाथ जी के स्वरुप की विशेषता*
*भगवान जगन्नाथ के हाथ-पैर नहीं हैं, आँखें बड़ी और गोल हैं।
*बलभद्र (शेषनाग स्वरूप) उनके दाहिने और सुभद्रा बीच में स्थित हैं।
*यह स्वरूप संसार के प्रति उनकी सहज करुणा और समर्पण का प्रतीक है।

*पुरी रथ यात्रा की कथा :-*
हर साल आषाढ़ मास में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा रथों पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर जाते हैं। इसे रथ यात्रा कहा जाता है, जिसमें लाखों भक्त शामिल होते हैं। यह यात्रा 9 दिन की होती है और फिर वे वापस आते हैं।

 

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