गणेश उत्सव की प्रथम शुरुआत
- गणेश जी का मूल स्वरूप ॐ माना जाता है।
इस रूप में उनकी प्रार्थना और पूजा आदिकाल से चालू है. कोई भी मंत्र हो ॐ अवश्य
लगा रहता हैं.
वेद प्रसिद्ध, ऋग्वेदके दूसरे मण्डलके मंत्रदृष्टा गृत्समद ऋषिने –
“गणानां त्वा गणपति ” हवामहे इस
ऋचाको सिद्ध करनेवाले एवं इस मंत्र के अनुसार व्यापक रुपसे गणराज्य देनेवाले स्वतंत्र देवता हैं.
यह प्रचार प्रारम्भ हुआ.
महाराष्ट्र मे लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जी के नेतृत्व में गणेशजी
उत्सव देश भक्ति के प्रचारार्थ एक राष्ट्रीय पर्व व राष्ट्रधर्म बन गया. स्वतंत्रता प्राप्ति हेतू तिलक जी ने
युक्ति पूर्ण गणेशजी के माध्यम
से धार्मिक भावना जागृत करके विचारों से ओतप्रोत समूह को भाषणों द्वारा देशभक्ति जगाई, देशभक्त, विद्वान, साहित्यिक, कवि, पत्रकार, लोकगीतकार, लावणी व नाटक कार अपने – अपने माध्यम से गणेश उत्सव द्वारा
अंग्रेजो से लड़ते रहें. आज हम
सभी भारतवासी देशभक्तो के
योगदान से स्वतंत्र हैं. आज देश – विदेशों में भी गणेश जी का गुणगान व पुजन हो रहा हैं.
* महाराष्ट्र के पूना जिला को
सर्वप्रथम सार्वजनिक गणेशोत्सव का श्रेय जाता हैं क्यों की –
– सर्वप्रथम पूना मे निजीरूपसे उत्सव सरदार कृष्णाजी काशीनाथ
उर्फ़ नाना साहेब खाजगीवाले
ने सर्वप्रथम सार्वजनिक रूप दिया.
– सन 1892 मे वे ग्वालियर गये
थे जहाँ उन्होंने राजकीय ठांट – बांट
का सार्वजनिक उत्सव देखा था, जिससे प्रभावित होकर पूना में भी उन्होंने 1893 में प्रारम्भ किया.
– पहले वर्ष खाजगीवाले घोटवडेकर और भाऊ रंगारीने
अपने यहाँ सार्वजनिक उत्सव मनाया.
– 1894 में उत्सव की संख्या
बहुत हो गई. शोभा यात्रा में
कौनसा गणेश आगे रहे इसलिए
ब्रह्मचारी बोवाने लोकमान्य और अन्नासाहेब पटवर्धन को निर्णायक बनाया. दोनों ने पूना के ग्रामदेवता
श्रीकसबा गणपति और जोगेश्वरी के गणपति को पहला व दूसरा और खाजगीवाले को तीसरा स्थान दिया.
– अष्टविनायक गणपति में से पांच गणपति पूना में स्थित हैं एवं दो स्थान कुलाबा जिला व एक स्थान अहमदनगर ऐसे आठ गणपति ” “अष्टविनायक” हैं.
– राजू गजभिये ( सीताराम )
साहित्यिक / पत्रकार